Sunday, September 28, 2008

"ओशो के विचारों पर मेरी निराशा "

मैं ओशो के विचारों से मूलतः सहमत नहीं रहा...ओशो /रजनीश के व्याख्यान इसलिए मैंने पढे कि एक दर्शन शास्त्र के व्याख्याता से "rational & unbiased" विवेचना की उम्मीद थी ...पर मैं निराश ही हुआ..
बुद्ध और जैन विचारधारा का कहीं तो समर्थन करते हैं, तो कहीं उनकी आलोचना ,वो भी एक ही मुद्दे पर... कही पर मूर्तिपूजा की "inevitability" पर बात करते है , तो कही उसके विरोध में...आपने पूर्व के चिन्तक -विचारक बंधुओं की बातों को नया मुलम्मा चढा कर पेश किया है.

"अगर एक स्त्री के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति के प्रति को अनुगत हो सकेगी, शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जायेगी .मंत्र का उपयोग स्त्री के टीके में किया गया है .....इस टीके को सीधा नहीं रख दिया गया उसके माथे पर,नहीं तो उसका स्त्रीत्व कम होगा --ओशो "

स्त्री के टीके पर उनके विचार भी मुझे हतोत्साहित कर गए ...उसी तरह जैसे ज्योतिष ,हस्तरेखा ,बाल-विवाह आदि पर उनके विचार पारंपरिक जड़ता से ग्रषित रहे . कई बार अपने ही विचारो के उनका विरोधाभास खुल कर सामने आया है .....

मैं बिना सोचे-समझे अनुकरण को गलत मानता हूँ. इतने सारे तथाकथित धर्मगुरुओं और सम्प्रदायों का कुकुरमुत्ते की तरह उग आना सोचनीय है...कट्टरवाद और आतंकवाद के मूल में यही अनुकरण है .एक जगह ओशो भी कहते हैं.."कोई बुद्धिमान व्यक्ति कभी किसी का अनुयायी नहीं होता ,सिर्फ बुद्धिहीन लोग अनुयायी बनते हैं .अनुयायियों की जमात बुद्धिहीनो की जमात है ...."फ़िर इतने सारे अनुयायी बनाने के पीछे क्या उनका ख़ुद का महानता का व्यामोह नही था ????
खुद के लिए कभी "भगवान" रजनीश, तो कभी "ओशो" कहना स्वीकारना महानता के व्यामोह से ग्रसित होना नहीं है तो क्या है ?बाद के दिनों में उनकी भाषा -शैली भी उन धर्म-गुरुओं की तरह ही हो गयी थी ,जो खुद को निर्वाण दिलाने का ठेकेदार घोषित करते पाए जाते है ।
कुल मिलकर सम्भोग की स्वच्छंदता की वकालत करते समय कुछ नया कहते दीखते है ,पर यहाँ भी "फ्रायड" की यौन-कुंठा प्रधान विचारधारा की ही नक़ल कर रहे हैं ।उनकी ही तरह सामान्यजन के हर आचार -विचार को यौन क्रिया के विभिन्न पहलुओं और विकृतियों के दायरे में बांध कर देखतें हैं, जो कि अब गलत सिद्ध हो चुकी है.
रजनीश जी दर्शन शास्त्र के मीमांसक रहे है ,इसलिए उनकी बातें दर्शन की विभिन्न धाराओं से प्रभावित हैं .पर कुल मिलाकर वो पुरानी शराब को नयी बोतल में नए लेबल के साथ पेश करते दीखते है . यह कोई बुरी बात नहीं है .पर दुःख और क्षोभ का विषय यह है कि इसके साथ वो "बुद्ध" की तरह महाबोध होने के बाद पैदा हुए विचार की बात जोड़ते हैं.

64 comments:

Kriti.. said...

main aapse puri tarah se sehmat hu dr. saheb,
ek waqt tha jab main osho ko bahut padhti thi... lekin jab se maine osho ki last book padhi.. publish kab hui yeh to yaad nahi kyunki maine puri padhi hi nahi but it was based on relationships.
i jst hate the way he says if you break up wid the current partner just search for the other partner.. that means ther's nothing called loyality exists in this world. even if the mistake was yours don't go n patch up wid your partner??
he also says if you are in love wid someone n u feel that you are no more in love wid that person jst leave them n go to the other whom you love now...
i got confused is this called love?? he simply wanna say never be loyal to your partner..

i never read him again...

moreover rahi baat anuyayi rakhne ki to main aapse pehle keh chuki hu ki i don't believe if i follow someone that means i dunno nything.. for me it means that i wanna know more n i respect the person n his/her views n that's y i follow him/her.


Regards
Kriti

रश्मि प्रभा said...

मैं स्वयं ओशो के विचारों से तारतम्य नहीं बैठा पाती
मैंने भी उनको पढ़ा...उनके तार्किक व्यक्तित्व को मानती हूँ,
पर मेरी बुध्धि की कसौटी पर वह निरर्थक है........
आपके विचार बिल्कुल खरे हैं

आदर्श राठौर said...

Aapka kathan sahi hai.
Main OSHO ka prabal virodhi raha, main ye manat hoon ki Osho ji ne agar 90% baatein agar galat, puraani aur faaltu kahi ya likhin hain to saath hi ye bhi vishwas karta hoon ki baaki ki 10 pratishat itni bebaak , sach aur abhootpoorv hain ki yaa to ham use samajh nahin paate ya kisi kaaran se samajhna nahin chaahte.
har baat se alag Osho ek asamany Vicharak the.
Khaas baat yahi hai ki Osho se wo apnaao jo achha lage, sehmat nahin ho to use chhod do, mat maano. Aur is baat ka pata tumhe khud chal jaat hai kyunki Osho tumhein Aaina dikhata hai.
JAI HIND

वेद प्रकाश सिंह said...

एक जगह ओशो भी कहते हैं.."कोई बुद्धिमान व्यक्ति कभी किसी का अनुयायी नहीं होता ,सिर्फ बुद्धिहीन लोग अनुयायी बनते हैं .अनुयायियों की जमात बुद्धिहीनो की जमात है ...."फ़िर इतने सारे अनुयायी बनाने के पीछे क्या उनका ख़ुद का महानता का व्यामोह नही था ???? bahut achhi tarah aapne unki galtiyon ko pakda hai.osho ke vichaar 100% sahi nahi hai.....mai to manta hoon ki swami vivekananda ke alawa aur doosra koi swami hai hi nahi....bahut philosphical baat kaha hai aapne...aapke vichar achhe lage.

सरस्वती प्रसाद said...

बहुत ही सुदृढ़ और संयमित विचारों को रूप दया है
ओशो की बातों से मेरा भी विरोध रहा है...........

Shastri said...

फिलहाल तो आपका आलेख पढते रहेंगे, एवं सहमति/असहमति बाद में बतायेंगे.

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

-- शास्त्री (www.Sarathi.info)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ओशो का तिलस्म टूटना चाहिए। सच्ची बातें ही स्थायी होती हैं। शब्दाडम्बर कुछ देर के लिए ही भरमा सकते हैं। ओशो इसे गढ़ने में माहिर थे।

पारम्परिक भारतीय दर्शन की मूल बातों से जितने अंश में उन्होंने अलग हटने की कोशिश की उतना अंश ही उनकी छवि बिगाड़ने वाला बना। फिर भी वे एक कुशल व्याख्याकार तो थे ही।

श्यामल सुमन said...

डा० साहब,

किसी के भी विचारों से पूरी तरह सहमत होना अक्सर संभव नहीं होता। "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना" वाली बात शाश्वत है। रजनीश जब तक जीवित थे, मैं भी उनकी बहुत सारी किताबों को पढा, कहीं सहमत हुआ तो कहीं असहमत। लेकिन कुछ खास बात अव्श्य थी उनकी शख्सियत में जो लोगों बाँधे रहने में सफल रहे और उनके बहुत अनुयायी भी बने। मेरे विचार से कुछ मुद्दे जो रजनीश ने उठाये, उसे आज भी खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन अपनी अपनी धारणाएँ हैं। मुझे एक शेर याद आ रहा है-

खुद अक्स उलट जाये तो क्या दोष है मेरा।
मैं वक्त का आईना हूँ, सच बोल रहा हूँ।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

हरि said...

ओशो एक चतुर वक्‍ता थे लेकिन जब आदमी ज्‍यादा बोलता है तो कहीं न कहीं तो विराधाभास तो होगा ही।

sangeeta said...

maine osho ko bahut nahi padha hai..kaaran ki bahut si baaten meri buddhi ke tark se baahar ki theen.unaka gahan darshan samajhne ki akal mujh men nahi hai.bahut se vichaar mere mann mutaabik nahi hain .unaki baaten aam aadami ki samajh se pare ki cheez hain.main bahut si baaton men unaka samarthan nahi kar sakti.

प्रदीप मानोरिया said...

मैं भी कभी ओशो का समर्थक नहीं रहा वरन यूँ कहे की उनका सदैव विरोधी ही रहा हूँ सुंदर अति सुंदर आलेख .. आपका चिठ्ठा जगत में हार्दिक स्वागत है निरंतरता की चाहत है .. मेरा आमंत्रण स्वीकारें समय निकल कर मेरे ब्लॉग पर पधारें

DHAROHAR said...

Oshh jaise vyaktitwa par kafi acha lekhan, Dhanyawad aur swagat.

HARI SHARMA said...

ओशो के विचारो के बारे मे और विरोधाभाशो पे अपने दृष्टि डाली. मुझे नहीं लगता ओशो ने कोई किताब लिखी हो. जो कुछ भी हमें पढने को मिलता है वो उनके भाषणों का संकलन है जिसका समय अलग अलग है.
आदमी वय के साथ बूढा ही नहीं होता उसके विचार भी बदलते हैं. समझ और जानकारी भी बढ़ती है. ओशो ने ये कभी नहीं कहा कि जो मे कह रहा हू वो करो या बही सच है. उनकी कोशिश लोगो को अनुयायी बनाने की नहीं थी वरन वो कहते थे कि लोग अपने स्तर पर सोचें.
जो कल ओशो का विरोध करते थे उन्होंने जब तर्क पर ओशो को कसा तो कुछ सहमत हुए कुछ असहमत. यही ओशो चाहते थे.
ओशो ने अपनी बात सैक्स से प्राम्भ की और वहीं से समर्थन और विरोध शुरू हो गया. लेकिन ओशो सैक्स से शुरू होते है ख़तम नहीं.
मुझे ओशो के विचार नहीं बल्कि विचारने का तरीका अच्छा लगता है. अच्छा होता भारत पाकिस्तान के साथ वार्ता के लिए राज्बयिको के बजाय ओशो जैसे तार्किक लोगो को भेजता. अमेरिका को भारत के सामने झुकने के लिए तब ओशो का समर्थन करता जब अमेरिका की धरती पर ओशो का झंडा लहरा रहा था. अमेरिका की सरकार को उनसे खतरा था उन्होंने जो उनके लिए उचित था वो किया भारत सरकार ओशो के द्वारा अमेरिका के साथ कूटनीति के खेल खेलता.

khalid said...

aap kuch jagah sahihai kuch baato me galat ........aisa hi osho ke saath hai .......aap kisi bhi se pudta sehma nahi ho sake hai .......par un mudo kiahvelana nahi karsakte hai jo unnoh ne uthaye .......is par behes achchi baat hai is ke liye aap ko badhaiho.jaisa ki ne kaha hthja अनुयायियों की जमात बुद्धिहीनो की जमात ............har abmi anokha hai kisi ke sab vicharo sesahmat nahi ho sakta hai .... kam se kam un se sochne ka tarita to sikh sakte hai .....main bhi un ki puri baato se sahmat nahi hun.........

Awaaz said...

आदरर्णीय डॉक्टर साहेब
मै आपके विचारों और लेख का सम्मान करते हुए बेहद विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ की कहीं कुछ चूक हो गई आपको 'ओशो' को समझने में |
अभी आप् एक बार फ़िर से ओशो को पढ़ना शुरू करें, बिना किसी पूर्वाग्रह के | चाहें बुद्ध हों या महावीर और चाहे गांधी ...... किसी ने अपने अनुयायी नही बनाए | आपने सुना है न ... मै अकेला ही चला था ........ .. कारवां बनता गया | जब हमारे संस्कार में आशाराम बापू घुसे हों तो ओशो को समझना मुश्किल ही है |
ओशो ने एक जगह कहा है मै अगर तुम्हे चाँद दिखा रहा हूँ तो सिर्फ़ ये मेरा चाँद है, तुम्हे अपना चाँद स्वयं खोजना और देखना होगा | तुम मुझे सुनकर बाद में मेरी उंगली पकड़कर मत बैठ जाना ...... जैसा तुम सब आज तक करते आए हो |
आम तौर पर मै कभी किसी के विचारों पर टीका - टिप्पणी नही करता, लेकिन जब आप् जैसा बुद्धिजीवी इस तरह की बात करता है तो बेहद दुःख होता है | बात बुरी लगी हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ | आपका अपना |

HARI SHARMA said...

Khalid jee, yadi aap doosro kee pooree baato se sahmat hote hai phir aapkee vicharsheelta kahan rahtee hai. tippnee likhne ka mera jo maksad tha uskee aapne pushti kee. baakee osho pee vakalat karna mera uddeshya nahee hai. swasth vahas ke liye hame hamesha tayaar rahna chahiye.

pragati said...

osho (aacharya Rajneesh)hamesha hi vivado me rahe apne jeeval kaal me bhi tatha martu ke baad bhi..parantu unke anuyayiyon ki itni adhik sakhya dekhkar ye to nishchit hai ki unke vicharon ko log maanyata dete hai ! anyatha unke itne adhik anuyayi nahi hote!

Neelima G said...

आप सभी महानोभवों के विचारों को पढने के बाद मुझे ऐसा लगता है आप लोगो ने ओशो को काफी पढ़ा है. लेकिन मैंने सिर्फ उनकी एक किताब पढ़ी है और मेरे विचार उसी से प्रेरित है. डॉक्टर गिरी के विचारों से मेरी सहमती पूर्ण रूप से है. हमने इस बारे में कई बार बात की है और मुझे नहीं लगता मैं अभी कुछ नया नहीं कह रही हूँ.

ओशो को समझने की कोशिश मैंने बहुत की लेकिन समझ नहीं पायी. उनके विचारो में कुछ बातें बहुत अच्छी होती है लेकिन जिस तरह से वो उनको समझाते है उसमे मुझे आपत्ति है. क्यूँ हर विषय को शारीरिक कोण से देखना और समझने की चेष्ठा करना? क्या सिर्फ शारीरिक सुख मिलने से जीवन सफल हो जाता है?

शायद मेरी यह सोच कुछ लोगो को अच्छी नहीं लगे, लेकिन विचारों का आदान प्रदान होना जरुरी है. ओशो की फिलोसोफी में मुझे कुछ बातें बहुत पसंद है जैसे उनका ये कहना की महिलाएं पुरूषों से किसी बात में कम नहीं है लेकिन इस बात को सिद्ध करने की लिए वो सब सेक्स का सहारा लेते है वो मेरे आपत्ति आमंत्रित करते है!!! यहाँ मैं उनकइ एक किताब को आधार मानकर कह रही हूँ जो उन्होंने महिलायों पर लिखी है.

नीलिमा

HARI SHARMA said...

नीलिमा जी आपकी आपत्ति सही हो सकती है. लेकिन ये देखे न कि हमारे समाज में सेक्स एक तब्बू बना हुआ है. और रजनीश की निंदा का कारण यही था. मेरी समझ मे यह भी जीवन के पुरुषार्थो का हिस्सा है. रजनीश जो कहना चाहता है वो ये कि औरत और आदमी अपनी अपनी जगह बराबर हैं. ना कम न ज्यादा. कुछ ताकते औरत के पास ज्यादा हैं और कुछ आदमी के पास और ये जैविक सचाई है. दूसरा ये कि जब औरत और आदमी के बीच फर्क की बात आयेगी तो जो भौतिक अंतर शारीरिक है वह भी चर्चा मे आएगा.
वहस अछे स्तर पर हो रही है अच्छा है.

Dr Prabhat Tandon said...

मै हरी जी की बात से सहमत हूँ , विचार इन्सान के हर पल बदलते रहते हैं , आज जो हम सोचते हैं कल तक जाते-२ उन्ही बातों पर हमारा विरोधाभास भी दिख जाता है । ओशो के सारे विचारों मै पूर्ण्तया सहमत तो नही हूँ विशेष कर सेक्स संबधित विषयों से लेकिन उनमे पुरातनपंथी , ढकोसलों और मूर्ढताओं से अकेले लडने के हौसले का हमेशा सम्मान करता रहा हूँ , एक पुस्तक पढने से ओशो के विचारों तक पहुँचना असंभव है , उनके विचार चाहे सेक्स के प्रति हो (भले ही हम उनसे सहमत हो या न हो ) , जनसंख्या विस्फ़ोट पर हो , बुद्ध के दर्शन , गीता दर्शन , गुरु नानक देव जी या गोरखनाथ या उपनिष्द पर उनके कही टिप्पणियाँ या प्रवचन हो , वह पढने और समझने योग्य हैं । विचारों की अभिच्यक्ति मे ओशो भीड का हिस्सा नही बल्कि अलग से दिखते हैं ।

Dev said...

mai aapse sahamat hoon aur nahi bhi,
Maine lagbhag 5 ya 6 saal pahle aise hi kuchha kitabe dekh raha tha, aur meri nigah ek magazine par padi.uspar likhi ek line ne mera dhayan khicha, magazine par likha tha -
"KABHI GALTI KARNE SE MAT DARNA VARNA TUMHARE PAIR CHLNE KI CHHMATA KHO DENGE" maine vah magazine li aur tab se aaj tak mai vah magazine le rahaa hoo, vah magazine thi "OSHO TIMES".
Maine jo mahshosh kiya vah yah ki OSHO ka pura prayaash man ko padhne ka tha , man kaise kam karta hai, man ke virodha bhash ko janana tha,man ki saktiyaoo ko pahchananaa tha aur OSHO pure jeevan bhar man par experiment karte rahe aur unka knowledge man ka adhayan karne walon ke liye ek achchha sangrah hai...

Mujhe lagata hai aap bhi kahi na kahi OSHO se prabhvit hai quki "osho ke vicharon par meri nirasha"
yah lekh kahi na kahi osho se aap ko prabhavit hona batata hai...
quki aap ne kisi aur ka khayal kyo nah kiya aur bahut se log hai par aap ne osho ko hi q choona...
yah osho ka prabhav hi hai ki aap ko osho ke pachh me ya bipachh me hona padega , aap shant nahi baith sakte osho se milne ke bad ya osho ko padhane ke bad...

Aisa nahi hai ki mai osho se bahut prbhavit hoon yaa nahi hoon...
Lekin osho ka man par kiya kam bahut bada hai...usase ham sab ko kuchh sikhana jarur chahiyeee

Aapke vichar bahut achchhe lage ,
Aur visayon par likhate rahiye , aapke navin vicharon ka entjaar rahega...

kya mai aapke blog ka url, apne blog par de sakta hoon aur aap mere
blog ka quki mujhe aap se baat karna achha lgega aur yah lamba chlega...

Regard..
Devesh
http://www.dev-poetry.blogspot.com/

nayeda............ said...

Osho ne samay samay par jo kaha wah pratipadan nahin, khandan aaur mandan nahin aek darshan yatra hai.osho ko aap yadi margdarshak ya marg bhatkanewale ke roop men dekhenge to jo vichar apne vyakt kiye kuchh kuchh aisa hi mehsoos hoga. agar jagrook ho, chaitnya ho unke kahe ko dekhenge (sahmat aaur asahamat hona anivarya nahin) to kuchh alag sa anubhav hoga. antat: vichar banane hi nahin hai, vichar shunya hona hai...kya fark padta hai usne kabhi kuchh aur kabhi kuch kaha. darshan dekhne aaur sar ko griahn karne ki baat hai...thothe ko udana hai. main osho ko mahaz ek helper samjhti hun apne ko jan-ne ki yatra men.

aaur fir kabhi.

Dr. RAMJI GIRI said...

ओशो के संबंध में इतने सारे मित्रों के विचारों से रू-बरू होकर मेरा बेहतरीन मार्ग दर्शन हुआ.मैं सभी का तहे-दिल से आभारी हूँ . अंत में मुझे यही कहना है कि आचार्य रजनीश दर्शनशास्त्र के ज्ञाता थे .और अपने से पहले के विचारकों और आचार्यों की बातों को कई जगह अपना लेबल लगा कर दोहराया है. इसलिए उनके विचार गलत हैं ये तो हो ही नहीं सकता .मेरा ऐतराज़ आचार्य रजनीश के द्वारा अपने को बुद्ध की तरह दिव्य-दर्शन से आच्छादित होने के दावे तथा खुद को 'भगवान' घोषित करने की बात से रहा है, जबकि काम उन्होंने पुरानी शराब को नई बोतल में पेश करने का ही किया है. अंत तक आते-आते उनके और अन्य प्रचलित धर्मगुरुओं में कोई अंतर नहीं रह गया था.

Akshaya-mann said...

मैंने मरने के लिए रिश्वत ली है ,मरने के लिए घूस ली है ????
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑

आप पढना और ये बात लोगो तक पहुंचानी जरुरी है ,,,,,
उन सैनिकों के साहस के लिए बलिदान और समर्पण के लिए देश की हमारी रक्षा के लिए जो बिना किसी स्वार्थ से बिना मतलब के हमारे लिए जान तक दे देते हैं
अक्षय-मन

'Yuva' said...

काफी संजीदगी से आप अपने ब्लॉग पर विचारों को रखते हैं.यहाँ पर आकर अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉग पर भी आयें. ''युवा'' ब्लॉग युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अभिव्यक्तियों को सार्थक रूप देने के लिए है. यह ब्लॉग सभी के लिए खुला है. यदि आप भी इस ब्लॉग पर अपनी युवा-अभिव्यक्तियों को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो amitky86@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं. आपकी अभिव्यक्तियाँ कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, वैचारिकी, चित्र इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती हैं......नव-वर्ष-२००९ की शुभकामनाओं सहित !!!!

आकांक्षा~Akanksha said...

सुन्दर ब्लॉग...सुन्दर रचना...बधाई !!
-----------------------------------
60 वें गणतंत्र दिवस के पावन-पर्व पर आपको ढेरों शुभकामनायें !! ''शब्द-शिखर'' पर ''लोक चेतना में स्वाधीनता की लय" के माध्यम से इसे महसूस करें और अपनी राय दें !!!

DR.MANISH KUMAR MISHRA said...

mai aap kay vicharo say sahmat hoon.

shailesh said...

ओशो ने अपनी बातों मैं पूरा जोर ध्यान पर दिया है . और ध्यान इसलिये की वह अपनी वक्तित्व से परिचित होसके अपनी निजता और अपनी सम्पूर्णता को समझ सके . और उन्होंने जो भी कुछ कहा है वो पूरा विरोधाभाष है और यही विरोधाभास उनको सबसे अलग खडा करता है . उनका मानना था की समाज एक मृत इकाई (unit) है . समाज कही एक्सिस्ट नहीं करता है , उनका कहना था की तुम अगर कभी समाज को ढूढने जाओ तो कहीं नहीं मिलेगा , मिलेगा तो व्यक्ति इसलिये व्यक्ति चेतना का रूपांतरण ही एक अर्थों मै समाज का रूपांतरण हो सकता है अन्यथा कोई भी तथाकथित सामाजिक क्रांति , कोई भी बदलाव नहीं ला सकती है

ओशो ने हमेशा ही कहा है की हर एक वस्तु या विचार द्वेत (duality) का मिश्रण है, कोई भी विचार या वस्तु तभी तक अस्तित्व मै है जब तक द्वेत है वैसे ही जैसे सत्य की चर्चा हम तभी कर सकते है जब तक असत्य है.

और सम्पूरण दर्शन (philosphy) या शास्त्र सिद्धांत एक subjective आईडिया है. यहाँ भोतिक विज्ञानं की तरह ठोस नियम नहीं है, यह समय, व जगह (space) के साथ लगातार बदलता है, और सभी सिदान्त या नियम हमेशा ही जड़ होते है, वो सामाजिक बदलावों को बहुत जल्दी आत्मसात नहीं कर पाते हैं. इसलिये ओशो मै विरोधाभास है वह विरोधाभास इसीलिये है की ,उनके द्वारा कही गयी कोई भी बात सिदांत या नियम ना बन जाये ! उनका कहना सिर्फ यही था "living is the only knowing"

shailesh said...

ओशो ने अपनी बातों मैं पूरा जोर ध्यान पर दिया है . और ध्यान इसलिये की वह अपनी वक्तित्व से परिचित होसके अपनी निजता और अपनी सम्पूर्णता को समझ सके . और उन्होंने जो भी कुछ कहा है वो पूरा विरोधाभाष है और यही विरोधाभास उनको सबसे अलग खडा करता है . उनका मानना था की समाज एक मृत इकाई (unit) है . समाज कही एक्सिस्ट नहीं करता है , उनका कहना था की तुम अगर कभी समाज को ढूढने जाओ तो कहीं नहीं मिलेगा , मिलेगा तो व्यक्ति इसलिये व्यक्ति चेतना का रूपांतरण ही एक अर्थों मै समाज का रूपांतरण हो सकता है अन्यथा कोई भी तथाकथित सामाजिक क्रांति , कोई भी बदलाव नहीं ला सकती है

ओशो ने हमेशा ही कहा है की हर एक वस्तु या विचार द्वेत (duality) का मिश्रण है, कोई भी विचार या वस्तु तभी तक अस्तित्व मै है जब तक द्वेत है वैसे ही जैसे सत्य की चर्चा हम तभी कर सकते है जब तक असत्य है.

और सम्पूरण दर्शन (philosphy) या शास्त्र सिद्धांत एक subjective आईडिया है. यहाँ भोतिक विज्ञानं की तरह ठोस नियम नहीं है, यह समय, व जगह (space) के साथ लगातार बदलता है, और सभी सिदान्त या नियम हमेशा ही जड़ होते है, वो सामाजिक बदलावों को बहुत जल्दी आत्मसात नहीं कर पाते हैं. इसलिये ओशो मै विरोधाभास है वह विरोधाभास इसीलिये है की ,उनके द्वारा कही गयी कोई भी बात सिदांत या नियम ना बन जाये ! उनका कहना सिर्फ यही था "living is the only knowing"

shailesh said...

ओशो ने अपनी बातों मैं पूरा जोर ध्यान पर दिया है . और ध्यान इसलिये की वह अपनी वक्तित्व से परिचित होसके अपनी निजता और अपनी सम्पूर्णता को समझ सके . और उन्होंने जो भी कुछ कहा है वो पूरा विरोधाभाष है और यही विरोधाभास उनको सबसे अलग खडा करता है . उनका मानना था की समाज एक मृत इकाई (unit) है . समाज कही एक्सिस्ट नहीं करता है , उनका कहना था की तुम अगर कभी समाज को ढूढने जाओ तो कहीं नहीं मिलेगा , मिलेगा तो व्यक्ति इसलिये व्यक्ति चेतना का रूपांतरण ही एक अर्थों मै समाज का रूपांतरण हो सकता है अन्यथा कोई भी तथाकथित सामाजिक क्रांति , कोई भी बदलाव नहीं ला सकती है

ओशो ने हमेशा ही कहा है की हर एक वस्तु या विचार द्वेत (duality) का मिश्रण है, कोई भी विचार या वस्तु तभी तक अस्तित्व मै है जब तक द्वेत है वैसे ही जैसे सत्य की चर्चा हम तभी कर सकते है जब तक असत्य है.

और सम्पूरण दर्शन (philosphy) या शास्त्र सिद्धांत एक subjective आईडिया है. यहाँ भोतिक विज्ञानं की तरह ठोस नियम नहीं है, यह समय, व जगह (space) के साथ लगातार बदलता है, और सभी सिदान्त या नियम हमेशा ही जड़ होते है, वो सामाजिक बदलावों को बहुत जल्दी आत्मसात नहीं कर पाते हैं. इसलिये ओशो मै विरोधाभास है वह विरोधाभास इसीलिये है की ,उनके द्वारा कही गयी कोई भी बात सिदांत या नियम ना बन जाये ! उनका कहना सिर्फ यही था "living is the only knowing"

Anonymous said...

Mera sirf itna kehna hai "JAKI RAHI BHAWNA JAISE PRABHU MURAT DEKHI TIN TAISEE" Osho ke mahaan vichaar ko na samjhane wale ka level kya ho sakta hai shayad kahne ki baat nahi...

राज भाटिय़ा said...

अरे इतने अच्छे आप ने लेख लिखा, बल्कि एक सच लिखा... फ़िर लिखना क्यो बन्द कर दिया ? ओशो के बारे मेन्रे विचार बिलकुल आप से मिलते है

Vikas said...
This comment has been removed by the author.
Vikas said...
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Sunita Sharma said...

आपने अपना लिंक भेजा इसके लिए धन्यवाद मैने आेशो को यदा कदा ही पढा है लेकिन उनके विचारों में क्रान्ति को महसुस किया है कुछ मामलो में वह काफी हद तक सही भी है आपके इस आलेख में जिस तरह आपने उनके विचारों पर सहमति नही जतायी उसी तरह किसी भी व्यक्ति के अनुभव उसके विचारों को जगह देते है ।
इस आलेख की माने तो मै आपसे सहमत हूं।
visit my blog Emotion's http://swastikachunmun.blogsot.com

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

osho ko maine bhi padha... jeevan ka unka najariya practicle nahi hai par achha hai....

jenny shabnam said...

docter sahab,
osho ke sath aapki asahmati hai, par itna virodh padhkar aashcharya hua mujhe.
mujhe yahi lagta hai ki unke prati ek purv-dhaarna man mein baith chuki hai aur shayad yahi wajah hai ki unki baat ko samjha nahi gaya. jiwan, samaj, parampara, rishte naate, vivaah, stree, shiksha... sabhi par unki soch kaafi sukshm aur kraantikari rahi hai, isliye graahya nahin hai.
osho sirf aanand ki baat karte hain, prem aur sanyaas ki baat karte hain. osho ne jo kaha hai waisa aaj tak kisi ne na socha hai na samjha hai na kaha hai.
kisi dharm-guru se unki koi tulna hin nahi ki ja sakti, kyunki wo dharm-guru nahin they, wo ek mahan vicharak aur pragatiwadi soch ke daarshanik they. osho ka virodh mujhe galat nahin lagta lekin bina samjhe hue karna nih-sandeh galat hai. shabdon mein na ulajhkar uske arth ki gahraai tak pahuncha jaye, tabhi unke prati sahmati ya asahmati munaasib hai.
osho ke prati meri koi andhbhakti nahin hai, lekin osho ke vichaar ko mere vichaar ke kareeb paati hun. aapke lekh dwara kafi logon ke vichar janne ka awsar mila, bahut dhanyawaad.

Dr. RAMJI GIRI said...

मेरे लेख में उठे सारे प्रश्न उनके ही विचारों और बातों को उद्धृत करते हुए कहे गए हैं...

अपने आश्रम में "ओशो" ने आखिरी के दिनों में लोगो को अपना दर्शन देने का रिवाज़ भी चलाया था..ये क्या था ??????????खुद को खुदा मान लेने का व्यामोह और दर्शनार्थी जानता पर दर्शन देकर उपकार करने का विभ्रम ?????

jenny shabnam said...

docter sahab,
aapne tathyapurn vichaar maanga hai, parantu main sirf apni tarkpurn baatein kah rahi hun.
aapke vichaar jaise sirf aapke hain, mere vichaar sirf mere hain, waise hin osho ke vichaar sirf unke hain. jo khud ko unke vichaaron ke kareeb pata hai unhe apna guru maan leta hai ya fir ek maarg-darshak ke roop mein maanta hai.
main osho ko ek aadarsh vichaarak aur daarshanik maanti hun jinse jiwan ko samajhne mein aasani hoti hai. unki soch se meri soch milti hai, isliye main unko padhti hun, par ye zaruri nahin ki har baat jo unko sahi lage mujhe bhi lage. unko kya kisi ko bhi main bhagwan nahin maanti.
osho ka sandesh hai... prem se jio, apni soch se jio, apne anubhaw se apni raah na talaasho, jiwan mein dhyaan ko utaaro, aanad se raho. aur ye sabhi baat kaun kis tareeke se samajhta hai ye to us vyakti ki samajh par hai. osho ne kabhi nahi chaaha ki koi unko guru maane ya unki baaton ko sirf isliye maan le ki wo unhone kaha hai.
jis tarah se geeta mein sri krishn ne sansaar aur jiwan kee shiksha di hai, sabhi tark uchit lagte hain fir kyun itne saare bhagwan, kyun itne matt? kuchh to wajah rahi hogi, kuchh to baat rahi hogi ki logon ne aur bhi sampradaay banaye tathaa log jude . yun agar aap kisi ka bhi updesh padhen to mool mein prem aur shaanti ki hin baat hai. prem aur shanti koi aawaran nahin jise koi pahan le, balki ye awastha hoti hai jis tak pahunchne ka alag alag raasta hai. osho ke anusaar bas ek hin raasta hai aur wo hai dhyaan ka raasta.
jise bhi ye lagta wo osho ke saath apni samjh se judtaa hai.
tathyapurn baaton keliye aap agar unke kuchh prawachan padhein to behtar ho. maan.na aur na maan.na apni jagah hai aur padhna apni jagah.
osho se aapki asahmati se mujhe osho se meri sahmati ka ek aadhar aur bhi mil gaya.
aapka bahut bahut dhanyawaad.

Chintan - चिन्तन said...

बहुत से विचारों से असहमति होने के बवजूद ओशो की कई बातों से मै सहमत हूँ । विशेष कर ध्यान संबधित प्रयोगों को लेकर । ओसो द्वारा प्रवचित बुद्ध , श्री कृष्ण , नानक जी , अष्टावक्र पर कमेन्ट्री को पहले पढॆं और फ़िर विचार करें ।

Anonymous said...

This article gives the light in which we can observe the reality. This is pretty nice one and gives in-depth information. Thanks for this nice article

Anonymous said...

Thanks for taking the time to discuss this, I feel strongly about it and love learning more on this topic. If possible, as you gain expertise, would you mind updating your blog with more information? It is extremely helpful for me.

Madhur Singh said...

mai aapke vichaaro se bilkul sehmat nahi hu....osho kehte hai...कभी-कभी कुछ मूर्ख लोग मेरे पास आते हैं और पूछते हैं: ´आपकी देशना क्या है? आपकी कौनसी ऐसी पुस्तक है जिसमें आपकी पूरी देशना का सार-सूत्र हो?´ मेरी कोई देशना नहीं है! तभी मेरी इतनी पुस्तकें उपलब्ध हैं। नहीं तो इतनी पुस्तकें कैसे संभव होती? अगर कोई विशेष देशना हो तो एक या दो पुस्तकें बहुत हैं। तभी तो मैं बोलता चला जाता हूं क्योंकि मेरी कोई देशना नहीं है। हर देशना एक न एक दिन चुक जायेगी। मैं नहीं चुक सकता। कहीं कोई आदि नहीं, कोई अंत नहीं... हम सदा मध्य में हैं। मैं कोई शिक्षक नहीं हूं।

osho ke vichaar 100% sahi nahi hai vo khud kehte hai..मैं जानबूझ कर असंगत,परस्पर-विरोधी हूं ताकि तुम मेरे शब्दों को किसी ज्ञान के सिद्धांत में न बांध सको। तो यदि एक दिन तुम कुछ संजोना शुरू करते हो तो अगले ही दिन मैं उसका खंडन कर देता हूं। मैं तुम्हें कुछ भी संजोने नहीं देना चाहता। ...मैं पूर्णतः विध्वंसक हूं, मैं तुमसे सब कुछ छीन लेना चाहता हूं।............

कृपया मुझे बुद्धि से समझने की कोशिश न करें। मैं कोई बुद्धिवादी नहीं हूं, बल्कि बुद्धि-विरोधी हूं। मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं, बल्कि दार्शनिकता विरोधी हूं। मुझे समझने की कोशिश करें। मुझे मौन होकर सुने, बिना किसी भीतरी वार्तालाप के, बिना कोई मूल्यांकन किये। ... जब तुम एक सुंदर सूर्यास्त देखते हो तो तुम इसे स्वीकारते हो या नकारते हो? तुम बस इसे देखते हो और उसे देखने में ही अर्थ छुपा है।

Unknown said...

मैं स्वयं को इसलिए भगवान कहता हूँ क्योंकि मैं भगवान हूँ, क्योंकि आप भी भगवान हैं, और क्योंकि वस्तुत: भगवान ही हैं, अन्यथा होने का कोई उपाय नहीं है। अस्तित्व का होने का दूसरा कोई तरीका ही नहीं हो सकता। आपको इसका पता हो या आपको इसका पता न हो। आप चाहें तो अपने को भगवान कहें, किन्तु भगवान न होने का कोई उपाय नहीं। लेकिन इस बात को समझना पडेगा, क्योंकि जीवन के विषय में यह एक बहुत ही क्रांतिकारी दृष्टिकोण है।
* जीवन को जांचने-परखने के केवल दो ही ढंग हैं। एक ढंग है यथार्थवादी का, वह जीवन को "पदार्थ" कहता है। दूसरा ढंग है कवि का, स्वप्न-द्रष्टा का, वह उसे "भगवान" कहता है।
" मैं एक कवि हूँ, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है। मैं यथार्थवादी नहीं हूँ। मैं अपने को भगवान कहता हूँ, तुम्हें "भगवान" कहता हूँ , पेड-पौधों को भगवान कहता हूँ, कंकड-पत्थर को भगवान कहता हूँ ... यह समष्टि, सारी सृष्टि एक ही तत्व से बनी है और मैंने उसी को भगवान नाम दिया है। मैंने उसे भगवान कहना चुना है।
Dr. Raj Giri....खुद के लिए कभी "भगवान" रजनीश, तो कभी "ओशो" कहना स्वीकारना महानता के व्यामोह से ग्रसित होना नहीं है तो क्या है ?
Osho says
मैं अपने को भगवान कहकर तुम्हें उकसाना चाहता हूँ , तुम्हें एक चुनौती देना चाहता हूँ। मैं अपने को भगवान केवल इसलिए कह रहा हूँ ताकि तुम भी उसे पहचानने का साहस जुटा सको। यदि तुम उसे मुझमें पहचान सकते हो तो देर नहीं, शीघ्र ही तुम उसे अपने में भी पहचानने लगोगे। "
" भगवान होना सबसे बड़ा दुस्साहस है। वह सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा है। "
"" भगवान शब्द का अर्थ होता है धन्यभागी, सौभाग्यशाली बस इतना ही। जिसे भीअपने स्वयं की सत्ता पहचानने का सौभाग्य मिल जाये, वहीं भगवान है। अपने को भगवान कहकर मैं भगवान को नीचे नहीं घसीट रहा हूँ, मैं तुम्हें ऊपर उठा रहा हूँ, मैं तुम्हें एक ऊर्ध्व यात्रा पर ले जा रहा हूँ।
"" मेरा अपने को भगवान कहना तो महज एक उपाय है, एक साधन है। मैं इसे किसी भी दिन छोड़ सकता हूँ - किसी भी दिन जब मैं देखूंगा कि इसने अपना काम करना शुरु कर दिया है और भगवानों की एक श्रृंखला बनना आरंभ हो गयी। किसी भी दिन जब कुछ लोग प्रदीप्त होकर जगमगाने लगेंगे और मुझे लगेगा कि अब इसकी आवश्यकता नहीं, मैं अपने को " भगवान " कहना बंद कर दूँगा

Anonymous said...

OSHO KE PRATI ASAHAMATI JATANE SE KUCH HAL NAHI HOGA. AAP LOGO KO SATYA KA KOYI PATA NAHI. SIRF VICHAR KARKE KUCH HAL HOTA HO . TO ABTAK SABHI DUNIYA MAIN AANAND HOTA. PAHLE SATYA KO JANO FIR OSHO KE BARE MAIN COMMENT KARO

kuldeep singh said...

ओशो के विचारो पर ये प्रलाप व्यर्थ है।।।

ओशो विचारो पर विचार नहीं... उनका उद्देश्य हमें निर्विचार की स्तिथि का अनुभव करवाना था...ज्ञान न तर्क में है ना ही अनुसरण में... ज्ञान अनुभवमें है।।

kuldeep singh said...

ओशो के विचारो पर ये प्रलाप व्यर्थ है।।।

ओशो विचारो पर विचार नहीं... उनका उद्देश्य हमें निर्विचार की स्तिथि का अनुभव करवाना था...ज्ञान न तर्क में है ना ही अनुसरण में... ज्ञान अनुभवमें है।।

सुज्ञान said...

ओशो अनुयायी नहीं थे इसलिए ज्ञान या धर्म की पूर्ण अनुभूति को प्राप्त हुए | हर जगह हर बात का एक ही अर्थ नहीं होता , उनके विचारों में तारतम्य बिठाने के लिए आपका उस ज्ञान को उपलब्ध होना जरुरी है| अन्यथा हमारे मन में शंका रह जायगी| सभी वाक्यों का सम्यक अर्थ जाने बिना किसी व्यक्ति विशेष को गलत ठहराना गलत है|सभी धार्मिक शास्त्रों में सभी बातें लिखी है किन्तु हर व्यक्ति उन बातों का अपने अपने हिसाब से अर्थ निकालता है|इसलिए आप सभी भी ओशो की सभी बातों को समझ कर सम्यक अर्थ ढूढने का प्रयास करें|
धन्यवाद

rohit sharma said...

aap log osho ko kya samjhenge.osho ko samjhne ke liye logic chahiye aur if u have logic then it need more then logic believe .

<<||KAB!R||>> said...

Mai aap ki baat se sahmat hun ...osho ek nirankar hai...!!! Osho ko samjhna thik waise hi hai.... Jaise ek atom bomb banana.......!!!
<<||KAB!R||>>

Anonymous said...

Achha Laga , Apki baat ko sunkar ,, , par mere hisaab se aapne apna faisla lene me jaldbaaji ki hai , jaisa k aapne kaha ki osho khud ki baato ko hi virod karte the , etc. , me aapko jyada takleef nahi dunga par itna kahunga ki aap osho ki ek pustak or padhe , mujhe ummeeed hai ki aapke saare prishno k uttar isme mil jayenge , pustak ka naam hai THE LAST TESTAMENT , ye duniya k anek patrakaro dwara osho se pooche gaye questions or uunke answers hai , aapki suvidha k liye me inke download link bhi de deta hu
http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol1.zip

http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol2.zip

http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol3.

http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol4.zip

http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol5.zip

http://oshoba.org/books/The%20Last%20Testamentvol6.zip


shukriya

loki said...

osho jaise carore me Ek hota hai . to uske vicharo ko samjheney wala bhi lakh me Ek hota hai

Digvijay Tiwari said...

PAHALI BAT TO YE KI AAP KYOUN CHAHTE HAI KI APP KISI KE VICHARO SE PURI TARAH SE SAHMAT HO JAYEN. AUR AGAR AAP AISI AASHA RAKHATE HAI TO PHIR AAP APNE MANUSHYA HONE KI SHAMTA PAR SAVAL KHADA KAR RAHE HAI. DUSARI BAT YE KI OSHO NE TUMHE YA DUNIYA KE KISI BHI VAYAKTI KO SANTUST KARE KA THEKA TO LIYA NAHI THA. OSHO NE AAPNI BAT KAHI JO USNE MASUS KIYA JO USKI DRISTI THI. AOUR ISME VIRODHABHAS SAMBHAV HAI KYOUN KI MANUSHYA MASHIN NAHI HAI. AOUR APP KHUD APNE JIVAN PAR DRISTI DALIYEGA KI KYA AAPNE KHUD KO NAHI GHUTHLAYA KYA. AUR AGAR KISI KE BHITAR VIRODHABHAS NAHI HAI TO PHIR USNE JIVAN ME KUCHA HI NAHI.
KISI BHI VISHYA YA VASTU PAR HAMESHA VIRODHABHASH TABHI HO SAKTA HAI JAB AAPKE JIVAN KA KENDRA VINDU VIRODH HO. JAISE COMMUNISTO KA HAL HAI UNHONE APNA JIVAN KEVAL DHARMO AUR UNKE SIDHANTO KE VIRODH ME LAGA DIYA AOUR. AOUR JO SIDHANT UNHONE BANAYE WO BHI YE DHAYN ME RAKH KAR BANAYE KI KAHI YE DHARMO SE MEL NA KHAYE. AOUR UNKA ASTITVA UN PAR AADHARIT HAI JO DHARM ME VISHWAS RAKHTE HAI AOUR YE DONO EK HI SIKKE KE DO PAHLU HAI. INME KOI FARK NAHI HAI. EK KAMRE ME BAND HAI AOUR EK KAMARE KE BAHAR BAND HAI. LEKIN BAND DONO HAI. EK SWATANTRA MASTISK APNI KHUD KI DRISTI KE AADHAR PAR CHALEGA YE HO SAKTA HAI KI WO KISI BINDU PAR DHARM KA VIRODH KARE AOUR KISI BINDU PAR DHARM SE MILATE PRTI HO. YA KABHI GANDHI KA VIRODH KARE YA KABHI GANDI KA SAMARTHAN. AAKHIR GANDHI SE KISI KI KYA DUSHMANI HO SAKTI HI AOUR KYA YARI. ISLIYE AAPKO OSHO ME VIRODHABHAS DIKHTA HIA. JO EK ORDINARY MIND KE LIYE SWABHAVIK HAI. AUR RAH GAI BAT AANUYAYI TO OSHO NE KI ANUYAYI HON MURKHATA PURN HAI LEKIN AGAR KOI AAP KO PREM DENE AATA HAI YA AAPKO GURU SAMAGH KAR SANIDHYA ME AATA HAI TO KYA AAP USE BHAGA DENGE. YA KHUD BHAG JAYEGE. PHIR AAP NAKARATMAK JIVAN JI RAHE HAI. OSHO NE NA KISI KO BULAYA NA KISI KO BHAGAYA. LOG AAYENGE SUNENGE JO MURKH HAI WO AANUYAYI BANEGE AOUR JO SAMAGH GAYA WO APNE BHITAR BHAV RAKE PHIR AAPNE RASTE PAR CHAL DENGE. AOU JO LOG KAHATE HAI KI MUGHE IJJAT SAMMAN NAHI CHAHIYE WO BHI GHAMAND AOUR MAHANTA KE BHAV ISI PRAKAR DUBA HAI JAISE KOI IJJAT AOU SAMMAN KE LIYE. HAI DONO EK DUSARE KE VIRODH ME LEKIN EK DUSARE PAR AASHRIT. AGAR OSHO KO LOG PASAND KARATE HAI TO YAS AOUR NAM TOP HOGA HI. OSHO USE ROK THODI NA DEGA. AOU AISA NAHI HAI KI BUDDH KOI VICHR KAR GAYE TO USKE BDAD JITANE BHI VICHAR HUYE WO SB DHELA HAI. WO BUDDH KA VICHAR THA AOUR VAHI VUICHAR JAB MANE JANA TO MERA HO GAYA. BUDDH KI THEKEDARI THODI NA HAI.AOUR VICHARO SE AGAR AAP KISI KA AAKALAN LAGAYENGE TO HAMESHA GALAT SIDH HOGE. MAHATVA PURN YE HAI KI WO VAYAKTI KYA HAI. YE JO MASTISHK HAI NA WO BAHUT BADA KHILADI HAI. KISI KE VICHAR KO MAT AMGHO USKE VICHAR KI DRISTI KO SAMGHO
THANKYOU.

Digvijay Tiwari said...

PAHALI BAT TO YE KI AAP KYOUN CHAHTE HAI KI APP KISI KE VICHARO SE PURI TARAH SE SAHMAT HO JAYEN. AUR AGAR AAP AISI AASHA RAKHATE HAI TO PHIR AAP APNE MANUSHYA HONE KI SHAMTA PAR SAVAL KHADA KAR RAHE HAI. DUSARI BAT YE KI OSHO NE TUMHE YA DUNIYA KE KISI BHI VAYAKTI KO SANTUST KARE KA THEKA TO LIYA NAHI THA. OSHO NE AAPNI BAT KAHI JO USNE MASUS KIYA JO USKI DRISTI THI. AOUR ISME VIRODHABHAS SAMBHAV HAI KYOUN KI MANUSHYA MASHIN NAHI HAI. AOUR APP KHUD APNE JIVAN PAR DRISTI DALIYEGA KI KYA AAPNE KHUD KO NAHI GHUTHLAYA KYA. AUR AGAR KISI KE BHITAR VIRODHABHAS NAHI HAI TO PHIR USNE JIVAN ME KUCHA HI NAHI.
KISI BHI VISHYA YA VASTU PAR HAMESHA VIRODHABHASH TABHI HO SAKTA HAI JAB AAPKE JIVAN KA KENDRA VINDU VIRODH HO. JAISE COMMUNISTO KA HAL HAI UNHONE APNA JIVAN KEVAL DHARMO AUR UNKE SIDHANTO KE VIRODH ME LAGA DIYA AOUR. AOUR JO SIDHANT UNHONE BANAYE WO BHI YE DHAYN ME RAKH KAR BANAYE KI KAHI YE DHARMO SE MEL NA KHAYE. AOUR UNKA ASTITVA UN PAR AADHARIT HAI JO DHARM ME VISHWAS RAKHTE HAI AOUR YE DONO EK HI SIKKE KE DO PAHLU HAI. INME KOI FARK NAHI HAI. EK KAMRE ME BAND HAI AOUR EK KAMARE KE BAHAR BAND HAI. LEKIN BAND DONO HAI. EK SWATANTRA MASTISK APNI KHUD KI DRISTI KE AADHAR PAR CHALEGA YE HO SAKTA HAI KI WO KISI BINDU PAR DHARM KA VIRODH KARE AOUR KISI BINDU PAR DHARM SE MILATE PRTI HO. YA KABHI GANDHI KA VIRODH KARE YA KABHI GANDI KA SAMARTHAN. AAKHIR GANDHI SE KISI KI KYA DUSHMANI HO SAKTI HI AOUR KYA YARI. ISLIYE AAPKO OSHO ME VIRODHABHAS DIKHTA HIA. JO EK ORDINARY MIND KE LIYE SWABHAVIK HAI. AUR RAH GAI BAT AANUYAYI TO OSHO NE KI ANUYAYI HON MURKHATA PURN HAI LEKIN AGAR KOI AAP KO PREM DENE AATA HAI YA AAPKO GURU SAMAGH KAR SANIDHYA ME AATA HAI TO KYA AAP USE BHAGA DENGE. YA KHUD BHAG JAYEGE. PHIR AAP NAKARATMAK JIVAN JI RAHE HAI. OSHO NE NA KISI KO BULAYA NA KISI KO BHAGAYA. LOG AAYENGE SUNENGE JO MURKH HAI WO AANUYAYI BANEGE AOUR JO SAMAGH GAYA WO APNE BHITAR BHAV RAKE PHIR AAPNE RASTE PAR CHAL DENGE. AOU JO LOG KAHATE HAI KI MUGHE IJJAT SAMMAN NAHI CHAHIYE WO BHI GHAMAND AOUR MAHANTA KE BHAV ISI PRAKAR DUBA HAI JAISE KOI IJJAT AOU SAMMAN KE LIYE. HAI DONO EK DUSARE KE VIRODH ME LEKIN EK DUSARE PAR AASHRIT. AGAR OSHO KO LOG PASAND KARATE HAI TO YAS AOUR NAM TOP HOGA HI. OSHO USE ROK THODI NA DEGA. AOU AISA NAHI HAI KI BUDDH KOI VICHR KAR GAYE TO USKE BDAD JITANE BHI VICHAR HUYE WO SB DHELA HAI. WO BUDDH KA VICHAR THA AOUR VAHI VUICHAR JAB MANE JANA TO MERA HO GAYA. BUDDH KI THEKEDARI THODI NA HAI.AOUR VICHARO SE AGAR AAP KISI KA AAKALAN LAGAYENGE TO HAMESHA GALAT SIDH HOGE. MAHATVA PURN YE HAI KI WO VAYAKTI KYA HAI. YE JO MASTISHK HAI NA WO BAHUT BADA KHILADI HAI. KISI KE VICHAR KO MAT AMGHO USKE VICHAR KI DRISTI KO SAMGHO
THANKYOU.

ASHOK KALWAR said...

प्यारे मित्रो, प्रणाम! क्या ? आप सभी जिसको अपना विचार कह रहे है ,वह आपके खुद के विचार है ? या उधार के है ? इस पर एक बार विचार करे !(इमानदारीपूर्वक/पक्षपातरहित होकर)एक चिकित्सक बनने के लिए सैद्धान्तिक/प्रयोगात्मक अध्यन के लिए जीवन के कम से कम २५ वर्ष खर्च करने के बाद भी, एक चिकित्सक उतना ही जान पाता है,कि कुछ ही बिमारियो को ठीक कर ले ! इसी तरह अध्यात्म/दर्शन के लिए कुछ फुटकर पुस्तको या इधर/उधर के कहे/सुने,बातो या बिचारो को अपना कहना फिर लिखना! जैसे कि ये मेरे ही विचार है,और इसी पर अब अन्त है! कुछ समय बिचारो पर विचार करने के लिए खर्च करे,और फिर कहे या लिखे की ये मेरे विचार है! फिर किसी और के बिचारो से सहमत या असहमत होने का कोइ प्रश्न ही नही उठता!!और अगर प्रश्न उठा तो वह आपका विचार नही है? क्योकि खुद से प्रकट विचारो के लिए किसी की सहमति की जरुरत नही होती ! जैसे कि ओशो को नही पडी !!
औरो के दीवानगी पर, होश वाले बहस फरमाये ! पहले उन्हे, दीवाना बनने की जरुरत है !!

G karle said...

Yes, I agree with u.... Sirtum jaisa dekhego waise hi Tumhe dikhega...

ghanshyam lodhi said...

ओशो और विचार? ओशो को मौन होकर ही आत्मसात किया जा सकता है इसलिए अपनी क्षुद्र बुद्धि से ओशो की विवेचना करने के बजाय ध्यान करे तो बेहतर फिर अपने आप ही ओशो समझ में भी आयेंगे और बुद्धि में भी

ghanshyam lodhi said...

ओशो को शब्दों से समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है... ओशो को समझना है तो मौन होना होगा..निर्विचार और चेतन्य होना होगा... ओशो कोई विचार नहीं है ...ओशो निर्विचार है... शब्दों से खेलने शायद शौक है.. उनको और फिर भी ओशो समझ न आये तो अपनी बुद्धि और अहंकार को दोष दीजिये ...शायद इस जन्म में ओशो आपके लिए नहीं है.. बेटर लक नेक्स्ट टाइम

swami dhyan nirav said...

OSHO KO SAMAJNE SE PAHLE TODA APNE AP KO SAMAJNE KI KOSHISH KAREN MR. RAM GIRI... KOI GEETA PDTA H... APKE ANUSARORIGINAL GEETA.. FIR OSHO KE DWARA GEETA PDTA H.. AUR YE KYA WO NACHNE LGA H.. KABIR AGR OSHO KE SAMAY ME HOTE TOH RO PDTE AUR OSHO KE PEIR PKD LETE.. TATKAL SHISHYA BNTE WO.. Q KI BOL TOH DIYA KABIR NE LEKIN UN SHABDON KA JAISA ARTH OSHO NE SMJAYA WAISA KABIR TOH KYA SWAYAM PARMATMA B UTAR ATA TO WO B ASAHAAY HOTA.. AUR YE AKELE KABIR KI HI BAT NI H.. CHAHE BUDDHA HON, MAHAVIR, NANAK MIRA ... ARRE M SABKA NAAM NI LE PAUNGA .. PL. SAMJNE KI KOSHISH KAREN .. AUR SUNO JO KAH RHE HO KI LAST ME WO APNA HI DARSHAN DENE KA ABHIYAN SHURU KIYA THA.. TOH APKI JANKARI KE LIYE BTA DUN KI WO APNE KO LAGATAR HATATE JA RHE HAIN .. SORRY M KBI UNKO PAST TENSE ME NI BOL SKTA... BHAKT KE LAKH CHAHNE PR AISA KIYA H UNHONE .. SUNO DR.. RAM .. M TUMHARI SARI BATON KA BHUT HI ACHI TRH SE JAWAB DE SKTA HUN.. PR YAHAN SHAYAD SAMBHAV NHI.. swami dhyan nirav 9452441218


Anonymous said...

OSHO KO SAMAJNE SE PAHLE TODA APNE AP KO SAMAJNE KI KOSHISH KAREN MR. RAM GIRI... KOI GEETA PDTA H... APKE ANUSARORIGINAL GEETA.. FIR OSHO KE DWARA GEETA PDTA H.. AUR YE KYA WO NACHNE LGA H.. KABIR AGR OSHO KE SAMAY ME HOTE TOH RO PDTE AUR OSHO KE PEIR PKD LETE.. TATKAL SHISHYA BNTE WO.. Q KI BOL TOH DIYA KABIR NE LEKIN UN SHABDON KA JAISA ARTH OSHO NE SMJAYA WAISA KABIR TOH KYA SWAYAM PARMATMA B UTAR ATA TO WO B ASAHAAY HOTA.. AUR YE AKELE KABIR KI HI BAT NI H.. CHAHE BUDDHA HON, MAHAVIR, NANAK MIRA ... ARRE M SABKA NAAM NI LE PAUNGA .. PL. SAMJNE KI KOSHISH KAREN .. AUR SUNO JO KAH RHE HO KI LAST ME WO APNA HI DARSHAN DENE KA ABHIYAN SHURU KIYA THA.. TOH APKI JANKARI KE LIYE BTA DUN KI WO APNE KO LAGATAR HATATE JA RHE HAIN .. SORRY M KBI UNKO PAST TENSE ME NI BOL SKTA... BHAKT KE LAKH CHAHNE PR AISA KIYA H UNHONE .. SUNO DR.. RAM .. M TUMHARI SARI BATON KA BHUT HI ACHI TRH SE JAWAB DE SKTA HUN.. PR YAHAN SHAYAD SAMBHAV NHI.. swami dhyan nirav 9452441218


Anonymous said...

ओसो को समझना सबके वश की बात नही है। ओसो की बाते हृदय की गहराई से निकलती है।
अगर समझ न आए तो गलत नही कह सकते है।
मानता हू गलती हो सकती है । वो भी तो मानव ही थे न। try to get understand the condition.

palash chandel said...

Insaan ki yah khubhi hoti hai ki wo kisi se bhi shat partishat(100%) shamat(agree) nahi hota, Abhiman ki bat hai bhai. Agar ap osho me negative batien dhundenge to negative hi payenge, even agar ap khud me bhi negative dhundenge to negative hi payenge.
Osho ek praticle guru hai, unki sare batien parcticle karne yogya hai, isliye unhone kha hai manno mat janno, unhone ye bhi kha hai, jo me kahu wo bhi mat mano phele janno.

Osho ne kaha hai sirf dhayan karo , baki sawalo ke jawab khud mil jayenge even sawal hi gir jayenge..

Baki ap sabhi ki soch ko pranam..

Unknown said...

मर्द लोग ही ओशो को समझ सकते है। जो ओशो को गलत कहते है वो गंभीर लोग है। गंभीर लोग क्या खाक ओशो को समझ पाएंगे।। सही कहते है ओशो की जैनो नई कृष्ण को नरक में डाल दिया क्योंकि उन्होंने हिंसा की और बचपन में रंग रलिया की। एक घटना के बहोत सारे अर्थ हो सकते है।। ओशो को और कृष्ण को दिल से समझा जा सकता है दिमाग से नही।। क्या ऐसा कोई गुरु हुआ है जो अपने प्रवचन के बाद बोलता है कि जो मैने कहा उसपर विश्वास मत करो, हो सकता है मैं गलत हु क्योकि ये मेरा अनुभव है इसीलिए तुम भी अनुभव करो क्र जानो की मैं सही कहता हूं या गलत।

Anonymous said...

okay