सच हमेशा सापेक्ष होता है.यह पृथ्वी चपटी है,यह बात सदियों तक सच ही थी, जब तक नयी खोज नये नज़रिये ने इसको गोलाकार सिद्ध करते हुए एक नये सच से इसको विस्थापित नही किया....
वैसे ही ब्रह्माण्ड की केन्द्र -बिन्दु भी तो हमारी पृथ्वी ही रही युगों तक, बाद में सूर्यदेव इसको इस सत्ता से विस्थापित कर नये केन्द्रित सच के रूप मे अवतरित हुए.अब तो न जाने कितने ही सूर्य और सौर्यमन्डल है इस ब्रह्माण्ड में,पता ही नही....
जब से मानव ने होश संभाला,तब से कितने ही काल-खन्ड गुजर गये इस सच के साथ---घने जंगलो के पार,पहाड़ की चोटी के पिछे से,नदी के उस छोर पर ,सागर के गर्भ से पूरब मे क्षितिज पर सूरज रोज सुबह उगता है....पर सदियाँ गुजर गयी तब नये सच ने कहा कि यह क्षितिज तो महज हमारी नज़रों का विभ्रम है ...और तो और, सूर्य का उदय और अस्त होना भी................सच तो यह है कि हमारी पृथ्वी ही घुमती रहती है उसके चारो ओर ,सूर्य तो वहीँ का वहीँ रहता है सुबह-शाम,दिन-रात...
देखने वाली बात यह है कि ये नए सच कब तक अपने सच की सत्ता पर सचमुच आसीन रह पातें है ?????????????
Monday, March 1, 2010
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9 comments:
नयी नयी खोजें नयी जानकारी देती रहती हैं...कभी ये भी हो सकता है की ये सच भी बदल जाये....
होली की शुभकामनायें
sach mai bahut achhi trah se aapne likha hai badhaai aapko
sach mai aapne bahut achha likha badhaai aapko
yahi bhram hi bana rahta hai
umeed par duniya kaayam hai chahe sach ho ya bhram
साइंस फिर से
एक और सच को जन्म देगी....
तब तक प्रतिक्षा.....
सस्नेह
गीता
dr.giri,
bahut achha likha hai aapne. jitni khoj hoti utni nai baaten pata chalti, nayee soch panapti, kuchh nayee samasya aati, kuchh naye samadhan milte. insaan ya brahmaand ka jiwan chakra bahut rahasyamayee hai. jitna bhi jaan lein jigyasa to bani hi rahti hai...shubhkamnayen.
sach to sapeksha hi hota hai.
डॉ० गिरी!
संभव है ये सच भी झूठ में बदल जाये....भौतिकता कभी स्थिर नहीं रहती, और हम भौतिक जगत के विषय में बात कर रहे हैं ....
सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाएं...
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